हर बार जनता बनी त्रिवेंद्र की ‘ताकत’ , विरोधी हाथ मलते रह गए

देहरादून। राज्य का विकास और जन कल्याण। यही दो सूत्र वाक्य हैं जिन्हें आधार बनाकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अपना राजकाज चला रहे हैं। प्रदेश में भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश है। नौकरशाही के पेंच कसे हुए हैं और कानून व्यवस्था पटरी पर है। जनता भी सरकार के कामकाज से संतुष्ट दिखती है। पिछले साढ़े तीन वर्ष के दौरान अपना मत प्रकट करने के लिए जनता को पांच मौके मिले, जिनमें मतदाताओं ने ‘त्रिवेन्द के नेतृत्व’ पर दिल खोलकर मुहर लगाई। बावजूद इसके विरोधी गुट त्रिवेंद्र के खिलाफ साजिशों का तानाबाना बुनता रहा और हर बार उसे मुँह की खानी पड़ी।
18 मार्च 2017 को त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री का पदभार संभाला। इसके लगभग एक साल बाद फरवरी 2018 में थराली के भाजपा विधायक गोविन्द लाल शाह का आकस्मिक निधन हो गया। रिक्त सीट पर उपचुनाव हुए तो तकरीबन सभी विरोधी दलों ने एकजुट होकर त्रिवेंद्र के शासन को चुनाव में चुनौती दी। दिलचस्प मुकाबले में बाजी भाजपा के हाथ लगी। इसके बाद नवम्बर 2018 में प्रदेश में नगर निकाय चुनाव का ऐलान हो गया। विकास और सुशासन के मुद्दे को लेकर भाजपा चुनावी मैदान में उतरी। जनता ने एकतरफा समर्थन देते हुए भाजपा को बड़ी जीत दिलवाई। चार महीने बाद ही देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई। अप्रैल 2019 में लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड में सभी 5 सीटें बीजेपी के खाते में गईं। साफ़ है कि केंद्र सरकार के साथ जनता ने त्रिवेंद्र सरकार के कामकाज को भी सहर्ष स्वीकार किया। इतना ही नहीं कैबिनेट मंत्री प्रदेश पंत का निधन होने से जून 2019 में पिथौरागढ़ विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ। भाजपा को इसमें रिकॉर्ड जीत हासिल हुई। फिर आम पंचायत चुनाव का बिगुल बज गया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की अगुवाई में पंचायत चुनाव में भी बीजेपी ने अपना परचम लहराया। इस तरह जनता की अदालत में पांच बार त्रिवेंद्र सरकार ऑनर्स मार्क्स से पास हुई। आम आदमी ने बार-बार त्रिवेंद्र सरकार पर भरोसा जताया। लेकिन जन फैसले के उलट साढ़े तीन साल की इस अवधि में त्रिवेंद्र के खिलाफ षड्यंत्र भी खूब हुए। उनकी कुर्सी हिलाने को अपने कुछ लोग ‘विभीषण’ हो गए। एकजुट हुए विरोधियों की बैठकों के कई दौर चले। सिर से सिर मिलकर साजिशें रची गईं। मुख्यमंत्री बदलने को हर फंडा अपनाया गया। त्रिवेंद्र के खिलाफ ठोस मुद्दे की तलाश की गई, पर ढूंढने से भी विरोधियों को कोई मुद्दा नहीं मिला। पांच साल पहले झारखण्ड में प्लांट किये गए एक कथित मामले को हर बार नए तरीके से पेशकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की छवि ख़राब करने के प्रयास होते रहे हैं। इतना जरूर है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र की ईमानदार छवि, कड़क मिजाज और पारदर्शी राजकाज को देखते हुए भाजपा का हाईकमान उनके साथ न सिर्फ मजबूती से खड़ा है बल्कि उनको लेकर अड़ा भी है। माफिया और भ्रष्टाचारियों के नापाक गठजोड़ को जनता भांप चुकी है। आमजन का कहना है कि विरोधियों की हर साजिश के बाद त्रिवेंद्र मजबूत होकर उभर रहे हैं। माफिया उन पर ‘वार’ कर रहा है और जनता लगातार उन्हें ‘मजबूत’ बना रही है।

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